एक गांव में दो व्यक्ति रहते थे। वे सौभाग्य हेतु अपने गुरू के पास गये। गुरू तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे। उन्होंने दोनों को अलग-अलग बुलाकर एक-एक चने का दाना दिया और कहा कि यह तुम्हारी तरक्की लायेगा। पहले व्यक्ति ने उस चने के दाने को एक चॉदी के डिब्बे में रख लिया और उसे हमेशा अपने पास रखता था। दूसरे व्यक्ति ने उस दाने को अपने बगान में गाड़ दिया। तीन दिनों में उस पर अंकुर आ गया। वह उसे पानी देने लगा। फिर चने के पौधे में ढेर सारे चने लगे जिन्हें वह बोता गया और धीरे-धीरे उसके चने की खेती बढ़ने लगी। अब उस व्यक्ति की रूची खेती में बहुत बढ़ गयी। वह ध्यान से फसल पर खाद पानी इत्यादि करने लगा।
5 साल बाद जब गुरू वापस लौटे तो पहला व्यक्ति उनसे मिला और बोला कि गुरू जी मैंने आपके आशीर्वाद को चांदी के डिब्बे में रखा परंतु मुझे अधिक लाभ नहीं मिला। गुरू जब दूसरे व्यक्ति के पास गया तो वह उन्हें एक गोदाम में ले गया जिसमें सैकड़ों चने के बोरे रखे हुए थे। वह उनके चरणों पर लोट गया।
गुरू, ईश्वर तथा कई बार हमारे उच्चाधिकारी हमें लाभ देने के लिए रास्ता तैयार करते हैं पर हम उनके इशारे समझ नहीं पाते और लाभ से वंचित रह जाते हैं । कई बार कोई इशारा भी नहीं होता हैं पर लाभ तय रहता हैं ।
पूना में अपनी पहली नौकरी हेतु मैं लगभग 7 कि.मी. कारेगांव पार्क से मुंडवा सायकल से जाता था। मेरे साथी व मुझसे एक वर्ष सीनियर इंजीनियर कंपनी की बस से आफिस पहुचते थे। 6 माह बाद कंपनी के मेकेनिकल सेक्शन से हमारे सिविल डिजाईन सेक्शन को एक स्कूटर एलाट हुआ। उस स्कूटर की हालत बहुत खस्ता थी। उस समय हमें साईट पर चेंकिग के लिए जाना पड़ता था तो हम कंपनी की जीप मांगकर जाते थे। हमारे बॉस ने समझाया के नियमित जाने वाले को ये स्कूटर काम आयेगा। मेरे सीनियरों ने मना कर दिया क्योंकि मेकेनिकल सेक्शन से उन्हें पता चला था कि हमारे सेक्शन को 3 मोटर सायकल मिलने वाली हैं । हमारे बैच वालों से हमारे बॉस ने जब स्कूटर का उपयोग साईट हेतु करने को कहा तब सबने मना कर दिया पर मैंने मना नहीं किया। कंपनी के खर्चे पर उस स्कूटर को सुधरवा कर मैं साईट पर आने-जाने लगा । स्कूटर से मुझे कई बार परेशानी भी हुई। मैं मन ही मन खुद को कोसता रहा। लगभग एक माह के बाद हमारे सेक्शन को एक मोटर सायकल मिली। हममें से सबसे सीनियर बहुत प्रसन्न हुये पर शाम को सबके सामने मुझको बुलाकर मेरे बॉस ने मोटर सायकल की चाबी दी और कहा की बड़े बॉस ने यह पहले से तय कर रखा था कि जो लड़का इस स्कूटर से आना-जाना करेगा उसे ही मोटर सायकल दी जायेगी। मेरे 6 सीनियरों को छोडकर मुझे वह बाइक मिली जो आगे मेरी तरक्की और सौभाग्य का कारण बनी।
जिंदगी मे बहुत बार परिस्थिति एवं प्रकृति के कारण हमारी 90% मेहनत का अलाभकारी परिणाम दिखने लगता हैं और हम हारकर उस कार्य को वहीं छोड़ देते हैं । कई बार कार्य पूर्ण करने पर भी हमें कोई लाभ न दिखता हैं , न मिलता हैं पर वही कार्य की पूर्णता आगे चलकर हमारी तरक्की का मार्ग प्रशस्त करती हैं ।
No comments:
Post a Comment