Tuesday, March 31, 2009

''स्वंय को जाने - विशेषज्ञों (गुरू ) की मद्द लेने में परहेज न करें''

एक बार भगवान बुध्द अपने प्रिय शिष्य आनंद के साथ एक नगर के किनारे रूके। आनंद उस नगर का चक्कर लगाकर लौटे और अपने गुरू से बोले - प्रभु आप तो बहुत दयालु हैुं, इस नगर के लोग बहुत दुखी हैं, उन्हे धर्म ज्ञान देकर मोक्ष दिलायें। तब महात्मा बुध्द ने मुस्कुराते हुये कहा कि कल सुबह उस नगर मे जाकर वहां के लोगो से पूछना कि उन्हे क्या चाहिये ? तभी मैं उनकी मोक्ष प्राप्ति की मनोकामना पूरी कर सकूंगा। प्रसन्न चित आनंद, दूसरे दिन नगर में गया। सबसे पहले उसे एक बुढ़िया मिली। वह बहुत दुखी दिख रही थी। उसने बुढ़िया से कहा कि मेरे गुरू तुम्हारी मनोकामना पूरी कर सकते हैं, तुम्हे क्या चाहिये ? बुढ़िया ने कहा- मेरा बेटा पिछले हफ्ते मर गया है, भगवान उसे वापस ले आयें। आनंद को फिर एक दुखियारा, भगवान का नाम लेकर रोते हुये, आदमी मिला। आनंद ने उससे पूछा, उसे क्या चाहिये ? तब उसने कहा- आलस्य की आदत के कारण मेरी नौकरी चली गई। मुझे बहुत सारा धन मिल जाये ताकि मुझे नौकरी न करनी पड़े। आगे चलकर आनंद को बहुत संपन्न सेठ मिला, जिसके बाल बच्चे भी मजे मे थे। सेठ से पूछने पर उसने कहा कि मुझे कई बीमारियां हैं। प्रभु मेरी बीमारियां को दूर कर दें। फिर उसे एक बैरागी मिला। आनंद को ऐसा लगा कि यह जरूर मोक्ष मांगेगा। जब उससे भी वही सवाल किया तो बैरागी ने कहा मुझे मेरी प्रेमिका दिलावा दो, जिसके कारण मैने बैराग लिया हैं। सवाल पूछते- पूछते रात हो गई परन्तु एक भी आदमी ऐसा नही मिला जिसने मोक्ष की मांग की हो।

आज के जमाने मे लोगो की अलग-अलग इच्छाऐं होती हैं। बहुत से लोगो को अपनी इच्छाओं तथा उद्देश्य के बारे में भी गलतफहमी रहती हैं। अपनी अस्पष्टता को दूर करने के लिये वे किसी भी गुरू की सत्ता स्वीकार नही करते, जबकि यह करना गलत नही हैं। जिस तरह पढ़ाने के लिये अलग-अलग श्रेणी के विशेषज्ञ ( शिक्षक ) हो गये हैं। उसी तरह अलग-अलग समस्या को सुलझाने, चाहतो को पूरी करने के लिए अलग-अलग व्यक्ति विशेष की मदद ली जा सकती हैं। आज हम किसी कार्य के विशेषज्ञ हो, परम ज्ञानी और पढ़े लिखे हो तो जरूरी नही है कि दूसरे क्षेत्र में कोई अनपढ़ हमसे ज्यादा न जानता हो।

उदयपुर राजस्थान निवासी मेरे नाना श्री मोहन लाल सोनी जी बहुत विद्वान व बजाज ग्रुप के अति प्रभावशाली अधिकारी रहें थे। उनमें लोगों की समस्याऐं चुटकी में सुलझाने की काबिलियत थी। ओजस्वी वक्ता एवं सुदर्शन व्यक्तिव् के मालिक थे। उन्होने बताया था कि जिन्दगी में उन्होने अलग-अलग लोगो ( गुरूओं ) से अलग-अलग बातें सीखी व अपने आचरण में लाई।

मैं इंदौर इंजीनियरींग कालेज में पढ़ रहा था। अपने दोस्तो मे काफी पापुलर था पर निरंकुश एवं स्वच्छंद हो चला था। मेरे नाना ने तब बिठाकर मुझे समझाया कि पहले अपनी जिन्दगी के उद्देश्य को समझो, अपनी चाहत को पहचानों। उसके बाद उस दिशा में कठोर परिश्रम करों। यदि कैरम अच्छा खेलना सीखना चाहते हो तो पहले सीधी गोटी लेना सीखों फिर प्रेक्टिस से डबल एम, क्ट मारना, रिबाउंड खुद सीख जाओगें। उसके बाद अपना स्तर और बढ़ाना हो तो उस क्षेत्र में महारथ प्राप्त व्यक्ति की शरण में जाने से न चूके। अपने गुरूर में न रहें कि हमें सब कुछ आता हैं। मुझे यह बात अच्छी तरह से समझ मे आ गई। मुझे भी समय-समय पर अपने क्षेत्र मे विशेष लोगो का मार्गदर्शन मिला। मैने अंध श्रध्दा के साथ उनका अनुशरण किया और सफलता पाई। उन सब के बारे में एक-एक कर विस्तार से लिखूँगा।

आप अपनी चाहत अथवा आवश्यकता के अनूसार उस क्षेत्र के विशेषज्ञ की मद्द लेने का प्रयास जरूर करें। अपने अहम तथा कम जानकारी की शर्मिदगीं का भाव अपने ऊपर कभी हावी न होने दें। ''स्वंय को जाने - विशेषज्ञों (गुरू ) की मदद लेने में परहेज न करें''

2 comments:

  1. बहुत आभार आपका इतनी ज्ञान की बात बताने के लिये.

    रामराम.

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  2. अगर आप उचित समझे तो वर्ड वैरिफ़िकेशन हटालें. बस एक सलाह से ज्यादा कुछ नही.

    रामराम.

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